संचिता सुषमा वाल्के 

देश का आम आदमी आखिर जाए तो जाए कहाँ?

पहले दूध महंगा हुआ, फिर CNG के दाम बढ़े और अब पेट्रोल-डीजल पर भी लगभग 3 रुपए की बढ़ोतरी। सिर्फ 48 घंटे के भीतर महंगाई ने ऐसा ट्रिपल अटैक किया है कि मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों का पूरा बजट हिल गया है। रसोई से लेकर सड़क तक, हर जगह जेब कट रही है।
सरकार और तेल कंपनियां अक्सर अंतरराष्ट्रीय बाजार, टैक्स स्ट्रक्चर और लागत बढ़ने का हवाला देकर अपनी जिम्मेदारी से बच निकलती हैं। लेकिन सवाल यह है कि हर बार बोझ सिर्फ जनता ही क्यों उठाए? जब कच्चे तेल के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार में नीचे आते हैं, तब राहत क्यों नहीं दिखती? और जैसे ही कीमतें बढ़ती हैं, उसका पूरा हिसाब आम आदमी से क्यों वसूला जाता है?दूध महंगा होने का मतलब सिर्फ चाय का खर्च बढ़ना नहीं है। इसका असर बच्चों के पोषण, घर के खाने और छोटे कारोबारियों तक पर पड़ता है। CNG महंगी होने से ऑटो, टैक्सी और सार्वजनिक परिवहन का किराया बढ़ेगा। पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ने का मतलब है—सब्जी, राशन, दवा, स्कूल बस, ट्रांसपोर्ट… हर चीज महंगी।यानी यह सिर्फ “3 रुपए” की बात नहीं है, बल्कि उस चेन रिएक्शन की शुरुआत है जो आने वाले दिनों में हर घर का हिसाब बिगाड़ देगी।सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वेतन वहीं का वहीं है, लेकिन खर्चे रोज नई छलांग लगा रहे हैं। मध्यम वर्ग टैक्स भी दे रहा है, महंगाई भी झेल रहा है और बदले में सिर्फ आश्वासन सुन रहा है। सरकार विकास के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन अगर आम आदमी की थाली, यात्रा और जिंदगी लगातार महंगी होती जाए तो ऐसे विकास का फायदा किसे मिल रहा है?महंगाई अब सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं रही, यह राजनीतिक और सामाजिक चिंता का विषय बन चुकी है। क्योंकि जब रसोई का बजट टूटता है, तब सबसे पहले आम परिवार का संतुलन बिगड़ता है।जरूरत इस बात की है कि सरकार तुरंत राहत देने वाले कदम उठाए। पेट्रोल-डीजल पर टैक्स कम हो, जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण हो और आम जनता को सिर्फ आंकड़ों से नहीं, जमीन पर राहत मिले। वरना “अच्छे दिनों” के वादे और बढ़ती महंगाई के बीच का फर्क जनता अच्छी तरह समझ चुकी है।