संकट के समय सिर्फ सरकार नहीं, नागरिकों की जिम्मेदारी भी तय होती हैं
संचिता सुषमा वाल्के
पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और लगातार महंगा होता तेल केवल अंतरराष्ट्रीय खबर नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है। ऐसे समय में अगर प्रधानमंत्री देशवासियों से संयम और जिम्मेदारी की अपील करते हैं, तो उसे केवल राजनीतिक बयान मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सोना कम खरीदने की सलाह हो, पेट्रोल-डीजल की बचत की बात हो, या पब्लिक ट्रांसपोर्ट और Work From Home को बढ़ावा देने की अपील — इन सभी सुझावों का सीधा संबंध देश की आर्थिक स्थिरता से है। भारत आज भी अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर विदेशी तेल पर निर्भर है। ऐसे में वैश्विक संकट का असर विदेशी मुद्रा भंडार, महंगाई और बाजार पर पड़ना तय है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं, बल्कि “जनभागीदारी मॉडल” की अपील है। सरकार यह संदेश देना चाहती है कि मुश्किल समय में केवल नीतियां नहीं, बल्कि नागरिकों की आदतें भी देश को मजबूत या कमजोर करती हैं।
हालांकि सवाल यह भी है कि क्या केवल जनता से त्याग की अपील काफी है? सरकार को समानांतर रूप से महंगाई नियंत्रण, वैकल्पिक ऊर्जा, रोजगार सुरक्षा और मध्यम वर्ग को राहत देने वाले ठोस कदम भी तेजी से उठाने होंगे। क्योंकि लंबे समय तक आर्थिक दबाव का बोझ केवल आम आदमी पर नहीं डाला जा सकता।
फिर भी यह सच है कि हर राष्ट्रीय संकट में छोटे-छोटे सामूहिक प्रयास बड़ा फर्क पैदा करते हैं। अगर लोग अनावश्यक खर्च, ईंधन की बर्बादी और विदेशी निर्भरता कम करने की दिशा में कदम बढ़ाते हैं, तो उसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक रूप से दिख सकता है।
देशभक्ति केवल नारों और सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित नहीं होती। कई बार जिम्मेदार नागरिक बनना ही सबसे बड़ा राष्ट्रधर्म होता है।