अब खीरा और टमाटर से उम्मीदें, जशपुर के किसान बदल रहे फसल पैटर्न
जशपुर| छत्तीसगढ़ का जशपुर जिला, जो कभी अपनी रसीली और मीठी लीची के लिए देशभर में विख्यात था, अब अपनी इस पहचान को खोने की कगार पर है। एक समय था जब यहाँ की लीची की महक पड़ोसी राज्यों ओडिशा और झारखंड तक पहुँचती थी, लेकिन पिछले दो सालों से फसल की बर्बादी ने किसानों की कमर तोड़ दी है। कभी 198 हेक्टेयर में लहलहाने वाले बागान अब वीरान होने लगे हैं और परेशान किसान लीची की खेती को अलविदा कह रहे हैं।
प्रमुख उत्पादन केंद्रों पर सन्नाटा
जिले के बगीचा ब्लॉक के झिंक्की, टटकेला, रायकेरा और अंबाडांड जैसे गाँव लीची उत्पादन के गढ़ माने जाते थे। यहाँ के किसान साल भर इस सीजन का इंतज़ार करते थे ताकि अच्छी आमदनी हो सके। लेकिन अब स्थिति विपरीत है; पेड़ों पर फल नहीं आ रहे और जो आ रहे हैं, वे कीड़ों की भेंट चढ़ रहे हैं। इस संकट ने किसानों के सामने रोजी-रोटी का सवाल खड़ा कर दिया है।
लीची के बदले सब्जियों पर भरोसा
नुकसान से तंग आकर कई किसानों ने कड़ा फैसला लेते हुए लीची के पेड़ों को काटकर वहां सब्जियों की खेती शुरू कर दी है। झिंक्की गाँव के किसानों का कहना है कि लीची साल में सिर्फ एक बार फल देती है, वह भी अब अनिश्चित हो गया है। इसके बजाय टमाटर और खीरे जैसी फसलें महज तीन महीने में तैयार हो जाती हैं, जिससे साल भर में कई बार मुनाफा कमाया जा सकता है।
प्रशासनिक उदासीनता से बढ़ी नाराजगी
किसानों ने उद्यान विभाग पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा कि फसल में लग रही बीमारियों की जानकारी देने के बावजूद उन्हें कोई तकनीकी सहायता नहीं मिली। किसानों के अनुसार, अधिकारियों ने मौके का मुआयना तो किया लेकिन समस्या का कोई ठोस समाधान देने के बजाय इसे लाइलाज बताकर पल्ला झाड़ लिया। किसानों का मानना है कि यदि समय रहते वैज्ञानिक सलाह और मदद मिलती, तो इन बागानों को बचाया जा सकता था।
मौसम की मार या कुछ और?
उद्यान विभाग के अधिकारियों ने इस गिरावट का मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन को बताया है। उद्यान अधीक्षक पिंगल कुजूर के अनुसार, तापमान में अनपेक्षित बदलाव और ओलावृष्टि ने लीची की पैदावार को बुरी तरह प्रभावित किया है। विभाग का कहना है कि प्राकृतिक आपदाओं के कारण फसल चक्र में बदलाव आया है और उन्होंने किसानों को धैर्य रखने की सलाह दी है।
हालांकि, किसानों का धैर्य अब जवाब दे रहा है और जशपुर की प्रसिद्ध लीची धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सिमटती नजर आ रही है।