रिकॉर्ड मतदान के पीछे की हकीकत: क्या कहता है SIR का असर?

संचिता सुषमा वाल्के 

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 92.72 प्रतिशत मतदान ने स्वाभाविक रूप से राजनीतिक हलकों में उत्साह और विश्लेषण की लहर पैदा कर दी है। पहली नजर में यह आंकड़ा अभूतपूर्व लगता है और इसे मतदाताओं की बढ़ती जागरूकता का प्रमाण माना जा रहा है। लेकिन यदि इस उच्च मतदान प्रतिशत को गहराई से समझा जाए, तो इसके पीछे केवल राजनीतिक उत्साह या ध्रुवीकरण ही नहीं, बल्कि मतदाता सूची में हुए व्यापक संशोधन—स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR)—की भी महत्वपूर्ण भूमिका नजर आती है। दरअसल, पिछले चुनावों की तुलना में इस बार मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर सुधार किया गया है। मृत, स्थानांतरित, लापता और फर्जी मतदाताओं के नाम हटाए जाने से कुल मतदाताओं की संख्या में लगभग 12 प्रतिशत की कमी आई है। ऐसे में स्वाभाविक है कि कम मतदाता संख्या के आधार पर मतदान प्रतिशत अधिक दिखाई देगा। इसका सीधा अर्थ यह है कि जो रिकॉर्ड मतदान दिख रहा है, वह आंशिक रूप से ‘साफ-सुथरी’ मतदाता सूची का परिणाम भी है, न कि केवल असाधारण जन-उत्साह का। यह कहना गलत नहीं होगा कि बंगाल ने अपनी पारंपरिक मतदान प्रवृत्ति को ही बनाए रखा है। राज्य में पहले भी उच्च मतदान का इतिहास रहा है और इस बार भी मतदाताओं ने उसी परंपरा को आगे बढ़ाया है। हालांकि, इस बार एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि मतदान आंकड़े अब अधिक यथार्थवादी और पारदर्शी प्रतीत होते हैं। फिर भी, मतदान के प्रति उत्साह को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। महिलाओं और युवाओं की सक्रिय भागीदारी, साथ ही तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच तीव्र चुनावी प्रतिस्पर्धा ने मतदाताओं को बूथ तक खींचने में अहम भूमिका निभाई है। राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से इस भारी मतदान की व्याख्या कर रहे हैं—जहां तृणमूल कांग्रेस इसे SIR के खिलाफ विरोध का संकेत मान रही है, वहीं भाजपा इसे विकास, सुरक्षा और वैचारिक समर्थन का प्रतिबिंब बता रही है। एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि SIR से जुड़ा विवाद स्वयं मतदाताओं के लिए प्रेरक कारक बन गया। देश के विभिन्न शहरों में काम करने वाले लोगों के बीच यह आशंका भी देखी गई कि यदि उन्होंने मतदान नहीं किया, तो उनकी नागरिकता या मताधिकार प्रभावित हो सकता है। परिणामस्वरूप, बड़ी संख्या में प्रवासी मतदाता अपने गृह क्षेत्रों में लौटे और मतदान में हिस्सा लिया। इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो यह स्पष्ट है कि इस बार का उच्च मतदान कई कारकों का संयुक्त परिणाम है। यह केवल लोकतांत्रिक जागरूकता का उछाल नहीं, बल्कि प्रशासनिक सुधार, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और मनोवैज्ञानिक कारकों का सम्मिलित प्रभाव है। अंततः, इस पूरे घटनाक्रम से एक सकारात्मक संकेत जरूर मिलता है—मतदाता अपने अधिकार के प्रति सजग हैं और लोकतंत्र में अपनी भागीदारी को लेकर गंभीर हैं। यदि मतदाता सूची की पारदर्शिता और निष्पक्षता इसी तरह बनी रहती है, तो आने वाले समय में भारतीय लोकतंत्र और अधिक सशक्त और विश्वसनीय बन सकता है।