मध्यप्रदेश में एक बार फिर तबादला नीति चर्चा के केंद्र में है। हर साल की तरह इस बार भी उम्मीदें बड़ी हैं, दावे बड़े हैं और “पारदर्शिता” का वादा भी उतना ही बड़ा। लेकिन जैसे-जैसे तस्वीर साफ हो रही है, यह सवाल भी उतनी ही तेजी से उठ रहा है—क्या यह सच में सुधार की कोशिश है या फिर पुराने सिस्टम को नए कवर में पेश करने की तैयारी?
डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में नई ट्रांसफर पॉलिसी लाई जा रही है। ऑनलाइन तबादले, 20 प्रतिशत की सीमा और तीन साल से अधिक समय से जमे अधिकारियों को हटाने जैसे प्रावधान सुनने में बेहद आकर्षक लगते हैं। लेकिन असली कहानी इन लाइनों के बीच छिपी है—जहां “मंशा” और “अनुमोदन” जैसे शब्द पूरी नीति की दिशा तय करते हैं।
अब इस पूरी कवायद में एक नया मोड़ जुड़ा है—जनगणना। सरकार ने साफ कर दिया है कि जनगणना ड्यूटी में लगे अधिकारी-कर्मचारी तबादलों से बाहर रहेंगे। वजह भी मजबूत है—केंद्र के निर्देश, टाइम-बाउंड काम और सख्त मॉनिटरिंग। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर बार कोई न कोई “विशेष कारण” नीति के दायरे को सीमित करने के लिए तैयार रहता है?
जब हर जिले में 15 से 20 प्रतिशत कर्मचारी जनगणना में लगाए जा रहे हैं, तो इसका सीधा मतलब है कि तबादला नीति का असर पहले से ही सीमित हो चुका है। यानी एक तरफ सरकार व्यापक सुधार का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर उसका बड़ा हिस्सा पहले ही “अपवाद” में बदल चुका है।
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि जिन कर्मचारियों के तबादले रोके गए हैं, उनके लिए “अलग प्रावधान” की बात कही जा रही है। लेकिन यह प्रावधान क्या होगा, कब लागू होगा और कितना निष्पक्ष होगा—इस पर चुप्पी है। अनुभव बताता है कि ऐसे अस्पष्ट वादे अक्सर फाइलों में ही खो जाते हैं।
तबादला नीति का असली उद्देश्य प्रशासन में गतिशीलता और जवाबदेही लाना होता है। लेकिन जब फैसले अंततः “विभागीय मंत्रियों की मंशा” पर निर्भर हों, तो पारदर्शिता का दावा खोखला लगता है। सवाल यह नहीं है कि जनगणना महत्वपूर्ण है या नहीं—सवाल यह है कि क्या प्रशासनिक सुधार हर बार किसी न किसी बहाने से अधूरे रहेंगे?
सरकार के सामने दोहरी चुनौती है—एक तरफ जनगणना जैसे राष्ट्रीय दायित्व को समय पर और निष्पक्ष तरीके से पूरा करना, और दूसरी ओर वर्षों से जमे प्रशासनिक ढांचे में जरूरी बदलाव लाना। लेकिन अगर दोनों में संतुलन नहीं बन पाया, तो न जनगणना की साख बचेगी और न ही तबादला नीति की विश्वसनीयता।
कड़वी सच्चाई यह है कि तबादले केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सत्ता का सबसे प्रभावी औजार भी होते हैं। ऐसे में यह देखना जरूरी होगा कि नई नीति वास्तव में सुधार लाती है या फिर “जनगणना” एक सुविधाजनक ढाल बनकर रह जाती है।
अंततः सवाल वही है—

क्या सरकार सिस्टम बदलना चाहती है, या सिर्फ सिस्टम को संभालने का दिखावा कर रही है?