बंगाल में ‘खेला’ या बदलाव? सत्ता बनाम सियासत की असली जंग
संचिता सुषमा वाल्के
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का सवाल नहीं हैं, बल्कि यह देश की राजनीति के दो अलग-अलग मॉडलों की सीधी टक्कर भी है—एक तरफ क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति, तो दूसरी ओर राष्ट्रीय विमर्श का विस्तार। सवाल सीधा है—क्या इस बार बंगाल में “खेला” सच में बदल जाएगा या फिर वही पुराना खेल नए नारों के साथ जारी रहेगा? पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पिछले डेढ़ दशक से सत्ता में है। इतने लंबे शासन के बाद सत्ता विरोधी लहर स्वाभाविक मानी जाती है, लेकिन बंगाल की राजनीति कभी भी “साधारण” नहीं रही। यहां चुनाव आंकड़ों से कम और भावनाओं, ध्रुवीकरण और आख्यानों से ज्यादा तय होते हैं।
भाजपा ने इस बार चुनाव को सीधा वैचारिक संघर्ष बना दिया है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में पार्टी “घुसपैठ”, “हिंदुत्व” और “सुशासन” के मुद्दों को लेकर मैदान में है। 2021 के नतीजों को देखें तो भाजपा ने जिस तेजी से जमीन बनाई, वह इस बार उसे और आक्रामक बना रही है। दूसरी ओर, ममता बनर्जी का पूरा दांव सामाजिक समीकरणों और विशेषकर अल्पसंख्यक वोटों के ध्रुवीकरण पर टिका नजर आता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या डर और भ्रम की राजनीति लंबे समय तक टिक सकती है? मतदाता सूची से नाम हटने जैसे संदेशों के जरिए वोटरों को लामबंद करना लोकतंत्र की मजबूती नहीं, उसकी कमजोरी का संकेत है। यह भी सच है कि बंगाल में लगभग 120 सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। लेकिन क्या हर चुनाव को केवल इसी चश्मे से देखा जाना चाहिए? यही वह बिंदु है जहां बंगाल की राजनीति बार-बार विकास के असली मुद्दों से भटक जाती है। शुभेंदु अधिकारी बनाम ममता बनर्जी की लड़ाई केवल सीट की नहीं, बल्कि प्रतीक की लड़ाई बन चुकी है। नंदीग्राम से शुरू हुआ संघर्ष अब पूरे राज्य की दिशा तय करने वाला बन गया है। चुनाव आयोग की सख्ती—बाइक बैन, केंद्रीय बल, बॉडी कैमरा—यह सब बताता है कि बंगाल में चुनाव अभी भी “सामान्य प्रक्रिया” नहीं, बल्कि “संवेदनशील ऑपरेशन” है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा माहौल क्यों बनता है जहां निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए इतनी सख्ती जरूरी हो जाती है?


इस चुनाव में एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि भाजपा ने पूरे देश के नेताओं को बंगाल में झोंक दिया है—योगी आदित्यनाथ से लेकर हिमंत बिस्वा सरमा तक। वहीं तृणमूल कांग्रेस का दायरा अब भी ममता और उनके सीमित नेतृत्व के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ दिखता है।
और फिर आती है राजनीति की “प्रतीकात्मक” लड़ाई—झालमुड़ी बनाम ढोकला! नरेंद्र मोदी का झालमुड़ी खाना जहां जनसंपर्क का हथियार बनता है, वहीं ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया उनके भीतर की बेचैनी भी उजागर करती है। जब चुनाव मुद्दों से हटकर खान-पान और भावनात्मक बयानबाजी पर टिक जाए, तो समझना चाहिए कि असली बहस कहीं पीछे छूट चुकी है। अब बात तमिलनाडु की। यहां एम.के. स्टालिन की द्रविड़ मुनेत्र कषगम सत्ता में है और मुकाबला पहले से ज्यादा पेचीदा हो चुका है। एडप्पा पलानीस्वामी की AIADMK और भाजपा गठबंधन एक तरफ है, तो दूसरी ओर अभिनेता थलापति विजय की नई एंट्री ने समीकरणों को त्रिकोणीय बना दिया है। तमिलनाडु में मुद्दे अलग हैं—भाषा, पहचान और क्षेत्रीय गौरव। लेकिन यहां भी एक बड़ा सवाल वही है—क्या मतदाता स्थिरता चाहता है या बदलाव? कुल मिलाकर, बंगाल और तमिलनाडु दोनों में चुनाव केवल सरकार बदलने या बचाने का नहीं, बल्कि राजनीतिक दिशा तय करने का है। भाजपा “डबल इंजन” की बात कर रही है, जबकि क्षेत्रीय दल “पहचान” की राजनीति को बचाने में जुटे हैं। आखिरकार फैसला मतदाता को करना है—क्या वह भावनाओं के शोर में बह जाएगा या ठोस मुद्दों पर वोट करेगा? इस बार बंगाल में सवाल सिर्फ “खेला होबे” का नहीं है…सवाल है—खेला बदलेगा या फिर वही कहानी दोहराई जाएगी?