“शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो” — बाबा साहेब के विचारों की आज भी प्रासंगिक पुकार
संचिता सुषमा वालके
14 अप्रैल 2026 को भारत रत्न डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर की 135वीं जयंती केवल एक स्मरण दिवस नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, समानता और न्याय के प्रति हमारे संकल्प को पुनर्जीवित करने का अवसर है। “शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो” का उनका संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना उनके जीवनकाल में था। डॉ. आंबेडकर केवल भारतीय संविधान के शिल्पकार ही नहीं थे, बल्कि वे एक दूरदर्शी अर्थशास्त्री, प्रखर समाज सुधारक और नारी मुक्ति के सशक्त समर्थक भी थे। उन्होंने ऐसे भारत की परिकल्पना की, जहां हर नागरिक को समान अधिकार, सम्मान और अवसर प्राप्त हो। उनका मानना था कि शिक्षा ही वह सबसे बड़ा साधन है, जो व्यक्ति को आत्मनिर्भर और समाज को प्रगतिशील बनाता है। संपादकीय दृष्टि से देखा जाए तो आज का भारत जिस लोकतांत्रिक मजबूती और सामाजिक जागरूकता का अनुभव कर रहा है, उसकी नींव बाबा साहेब के विचारों और उनके संघर्षों में ही निहित है। उन्होंने समाज के वंचित और पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाने के लिए जो प्रयास किए, वे आज भी प्रेरणा का स्रोत हैं। विशेष रूप से महिलाओं के अधिकारों को लेकर उनका दृष्टिकोण अत्यंत प्रगतिशील था। उन्होंने महिलाओं को शिक्षा, संपत्ति और सामाजिक भागीदारी के समान अधिकार दिलाने की दिशा में ऐतिहासिक कार्य किए। आज जब हम नारी सशक्तिकरण की बात करते हैं, तो उसमें बाबा साहेब की सोच स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। “जय भीम” केवल एक नारा नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और आत्मसम्मान का प्रतीक है, जबकि “जय भारत” राष्ट्र निर्माण के प्रति हमारी प्रतिबद्धता का परिचायक है। बाबा साहेब का जीवन हमें सिखाता है कि संगठित प्रयास और निरंतर संघर्ष से ही समाज में सकारात्मक परिवर्तन संभव है। आज, उनकी 135वीं जयंती पर यह आवश्यक है कि हम उनके विचारों को केवल स्मरण तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने आचरण में उतारें। एक शिक्षित, संगठित और संघर्षशील समाज ही सशक्त भारत की वास्तविक आधारशिला बन सकता है।